बीती हुई घटनाओं के अध्ययन को इतिहास कहते हैं। इतिहास हमें यह समझने में सहायता करता है कि मानव ने किस प्रकार अपने वातावरण पर विजय प्राप्त की और आज की सभ्यता का विकास किया। सामान्यतः यह धारणा बनी हुई है कि इतिहास केवल युद्धों और राजाओं की कहानियों तक सीमित होता है, लेकिन वास्तव में इतिहास इससे कहीं अधिक व्यापक विषय है।
इतिहास में उपलब्ध स्रोतों के आधार पर समाज, अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक प्रवृत्तियों का दीर्घकालीन विश्लेषण किया जाता है। इतिहासकार घटनाओं का केवल वर्णन ही नहीं करता, बल्कि यह भी समझने का प्रयास करता है कि किसी घटना के घटित होने के कारण क्या थे और उसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ा।
जब कोई नया प्रमाण सामने आता है या पुराने प्रमाणों की नई व्याख्या होती है, तब अतीत के बारे में हमारी समझ और अधिक समृद्ध हो जाती है। इतिहासकार तथ्य और कल्पना के बीच अंतर करता है, हालाँकि मौखिक परंपराओं और मिथकों में भी अतीत की स्मृतियाँ छिपी हो सकती हैं। इतिहासकार का मुख्य कार्य विभिन्न ऐतिहासिक प्रमाणों की जाँच करके सत्य को सामने लाना होता है।
प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्निमाण के लिए विभिन्न प्रकार के स्रोतों की आवश्यकता होती है। स्रोत स्वयं अतीत को नहीं बोलते, बल्कि इतिहासकार उन्हें अर्थ प्रदान करता है। इसके लिए वह स्रोत खोजता है, ग्रंथों का अध्ययन करता है, सुरागों का अनुसरण करता है और उपयुक्त प्रश्न उठाकर प्रमाणों की सत्यता की जाँच करता है।
1826 ई. में चार्ल्स मेसन ने पश्चिमी पंजाब के हड़प्पा गाँव में प्राचीन दीवारों के अवशेष देखे। लगभग पचास वर्ष बाद सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने वहाँ से कुछ मुहरें प्राप्त कीं। लेकिन इसके भी पचास वर्ष बाद जॉन मार्शल ने इस स्थान को सिंधु घाटी सभ्यता के केंद्र के रूप में पहचाना। यह उदाहरण बताता है कि ऐतिहासिक निष्कर्ष समय, अध्ययन और प्रमाणों की पुष्टि के बाद ही निकाले जाते हैं।
इसी प्रकार राजा हर्षवर्धन की पराजय का उल्लेख उनके जीवनचरित ‘हर्षचरित’ में नहीं मिलता, जबकि चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय के शिलालेख में हर्ष की पराजय का दावा किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि दरबारी लेखक अपने आश्रयदाता की कमियों को छिपा सकते हैं, इसलिए इतिहासकार को सावधानी से अध्ययन करना पड़ता है।
इतिहास शब्द का शाब्दिक अर्थ है — “ऐसा हुआ”। पहले केवल लिखित अभिलेखों को ही इतिहास का प्रमाणिक स्रोत माना जाता था, क्योंकि उनकी जाँच और तुलना संभव थी। मिथक और लोककथाओं को अविश्वसनीय समझा जाता था। लेकिन आधुनिक इतिहास लेखन में गैर-पारंपरिक स्रोतों को भी महत्व दिया जाने लगा है, बशर्ते उनकी पुष्टि अन्य प्रमाणों से की जा सके।
महाभारत इसका अच्छा उदाहरण है। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इसमें वर्णित युद्ध हुआ था, जबकि अन्य इतिहासकार बिना अन्य प्रमाणों के इसे ऐतिहासिक तथ्य मानने को तैयार नहीं हैं। संभवतः इसकी मूल कथा सूतों द्वारा मौखिक रूप से रची गई थी, जो पीढ़ी दर पीढ़ी स्मृति के रूप में सुरक्षित रही।
भारत का अधिकांश प्राचीन साहित्य धार्मिक प्रकृति का है। वेदों की रचना लगभग 1500 ई.पू. से 500 ई.पू. के बीच मानी जाती है। वेद चार हैं—ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद। उपनिषदों में आत्मा और परमात्मा पर दार्शनिक विचार मिलते हैं।
रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य भारतीय समाज, संस्कृति और राजनीति की महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। महाभारत का मूल नाम ‘जय संहिता’ था, जो आगे चलकर विशाल ग्रंथ बन गया।
उत्तर-वैदिक काल में श्रौतसूत्र और गृह्यसूत्र जैसे ग्रंथों की रचना हुई, जिनमें यज्ञ और संस्कारों का विवरण मिलता है।
बौद्ध ग्रंथ ‘त्रिपिटक’ तथा ‘जातक कथाएँ’ उस समय की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को समझने में अत्यंत उपयोगी हैं। जैन ग्रंथ ‘अंग’ प्राकृत भाषा में लिखे गए और छठी शताब्दी में संकलित हुए।
धर्मशास्त्र, मनुस्मृति, कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’, पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ तथा कालिदास की रचनाएँ इतिहास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत हैं। ‘राजतरंगिणी’ कश्मीर के इतिहास का प्रमुख ग्रंथ है।
पत्थर, धातु या ताँबे की पट्टियों पर खुदे लेखों को अभिलेख कहा जाता है। अशोक के शिलालेख भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इनसे प्रशासन, धर्म और सामाजिक जीवन की जानकारी मिलती है।
सिक्कों का अध्ययन मुद्राशास्त्र कहलाता है। सिक्कों से उस काल की अर्थव्यवस्था, व्यापार, कला और धार्मिक प्रतीकों की जानकारी मिलती है।
पुरातत्त्व के माध्यम से भौतिक अवशेषों का अध्ययन किया जाता है। लेखन से पहले के इतिहास (प्रागैतिहासिक काल) को समझने में पुरातत्त्व की भूमिका सबसे अधिक है।
भारत का प्रामाणिक इतिहास मौर्य काल से माना जाता है, क्योंकि इसी काल से साहित्यिक और पुरातात्त्विक दोनों प्रकार के प्रमाण एक साथ उपलब्ध होते हैं। इससे पहले के काल में दोनों प्रकार के स्रोत एक साथ नहीं मिलते।
इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह मानव विकास, समाज, संस्कृति और सभ्यता को समझने का सशक्त माध्यम है। विभिन्न साहित्यिक, पुरातात्त्विक और मौखिक स्रोतों के अध्ययन से ही इतिहास का पुनर्निमाण संभव है। भारतीय इतिहास अपनी विविधता और गहराई के कारण विश्व इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखता है।